MeToo मामले में नाना पाटेकर को बड़ी राहत, कोर्ट ने खारिज की एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता की याचिका

बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर नाना पाटेकर के खिलाफ उनकी को-एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता ने साल 2018 में लगाए गए ‘मीटू’ आरोपों पर मुंबई की एक अदालत ने शुक्रवार (7 मार्च) को संज्ञान लेने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि शिकायत सीमा अवधि से परे दर्ज की गई थी और इसमें देरी का कारण भी नहीं बताया गया था. वहीं, मामले में मुंबई पुलिस की ओर से दाखिल ‘बी समरी’ रिपोर्ट को भी ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया है.

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (अंधेरी) एनवी बंसल ने शुक्रवार को कहा कि तनुश्री दत्ता ने 23 मार्च 2008 को कथित रूप से घटित एक घटना को लेकर 2018 में प्राथमिकी दर्ज कराई थी. अक्टूबर 2018 में दर्ज अपनी शिकायत में तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर और तीन अन्य लोगों पर 2008 में फिल्म ‘हॉर्न ओके प्लीज’ के सेट पर एक गाने की शूटिंग के दौरान उनके साथ उत्पीड़न और दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया था. यह मुद्दा नेशनल लेवल पर सुर्खियों में आया था और सोशल मीडिया पर हैशटैग MeToo शुरू हो गया.

पुलिस ने 2019 में मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने अपनी अंतिम रिपोर्ट दायर की, जिसमें कहा गया कि उसकी जांच में किसी भी आरोपी के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में आगे कहा कि एफआईआर झूठी पाई गई. कानूनी भाषा में ऐसी रिपोर्ट को ‘बी-समरी’ कहा जाता है.

उस समय तनुश्री दत्ता ने एक याचिका दायर कर कोर्ट से ‘बी-समरी’ को खारिज करने का आग्रह किया था. उन्होंने कोर्ट से अपनी शिकायत की आगे की जांच का आदेश देने का आग्रह किया था.

मजिस्ट्रेट ने कहा था कि तनुश्री दत्ता ने 23 मार्च 2008 को एक घटना को लेकर 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 354 और 509 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी. उन्होंने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के प्रावधानों के अनुसार दोनों अपराधों की सजा की अवधि तीन साल है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि सीमा अवधि निर्धारित करने का उद्देश्य क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन पर दबाव डालना है, ताकि वे अपराध का जल्द पता लगाने और सजा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करे.

आदेश में कहा गया है कि प्रॉसिक्यूशन और सूचना के देरी के कारणों से कोर्ट को अवगत कराने में जो देरी हुई है, उसके लिए कोई भी माफी के लिए कोई आवेदन दायर नहीं किया गया है.

मजिस्ट्रेट ने कहा, ‘इस प्रकार, सीमा अवधि समाप्त होने के बाद सात साल से अधिक समय बीत जाने के बाद मेरे सामने संज्ञान लेने का कोई कारण नहीं है, यदि बिना किसी पर्याप्त कारण के इतनी बड़ी देरी को माफ कर दिया जाता है, तो यह समानता के सिद्धांत और कानून की सच्ची भावना के खिलाफ होगा.’ उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि घटना ‘सीमा के भीतर नहीं है और कोर्ट को इसका संज्ञान लेने से रोका जाता है.’ इसमें कहा गया है, पहली घटना को न तो झूठा कहा जा सकता है और न ही सच, क्योंकि कोर्ट ने कथित घटना के तथ्यों पर विचार नहीं किया है.